भारत में दिवालियापन और बैंकरप्सी कोड (संशोधन) विधेयक, 2025: प्रमुख प्रावधान, न्यायिक निर्णय और प्रभाव

 

भारत में दिवालियापन और बैंकरप्सी कोड (संशोधन) विधेयक, 2025: प्रमुख प्रावधान, न्यायिक निर्णय और प्रभाव


🔍 परिचय

दिवालियापन और बैंकरप्सी कोड (संशोधन) विधेयक, 2025 भारत के दिवालियापन ढांचे में महत्वपूर्ण सुधारों का प्रस्ताव करता है। यह विधेयक वित्तीय लेनदारों को अधिक अधिकार प्रदान करता है, समूह और सीमा-पार दिवालियापन मामलों को सरल बनाता है, और प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करता है।


⚖️ प्रमुख प्रावधान

1. लेनदार-प्रेरित समाधान प्रक्रिया (CIIRP)

  • लागू: कुछ निर्धारित श्रेणियों के कॉर्पोरेट देनदारों पर।

  • प्रारंभ: कम से कम 51% वित्तीय लेनदारों की सहमति से।

  • प्रक्रिया: देनदार को कम से कम 30 दिन का समय दिया जाएगा प्रतिक्रिया देने के लिए।

2. समूह दिवालियापन

  • लक्ष्य: एक समूह के दो या दो से अधिक देनदारों के लिए एकीकृत समाधान प्रक्रिया।

  • प्रावधान: सामान्य NCLT पीठ, संयुक्त समिति ऑफ़ क्रेडिटर्स (CoC), और एक सामान्य समाधान पेशेवर की नियुक्ति।

3. सीमा-पार दिवालियापन

  • लक्ष्य: विभिन्न देशों में परिसंपत्तियों या लेनदारों वाले देनदारों के लिए एकीकृत समाधान ढांचा।

  • प्रावधान: केंद्रीय सरकार को नियम बनाने का अधिकार।

4. CIRP की अनिवार्य स्वीकृति

  • न्यायाधिकरण: NCLT को आवेदन प्राप्त होने के 14 दिनों के भीतर आदेश पारित करना अनिवार्य।

  • दस्तावेज़: वित्तीय संस्थानों से प्राप्त रिकॉर्ड पर्याप्त प्रमाण माने जाएंगे।

5. विलयन में CoC की शक्तियाँ

  • नियंत्रण: CoC को विलयन प्रक्रिया की निगरानी और विलयन पेशेवर को बदलने का अधिकार।

6. विलयन की समयसीमा

  • समाप्ति: 180 दिनों में, 90 दिनों का विस्तार संभव।

  • स्वैच्छिक विलयन: एक वर्ष के भीतर समाप्ति अनिवार्य।

7. मूर्खतापूर्ण कार्यवाही पर दंड

  • दंड: ₹1 लाख से ₹2 करोड़ तक का जुर्माना और/या 5 वर्ष तक की सजा।

8. होमबॉयर्स के अधिकार

  • समानता: होमबॉयर्स की देनदारियों को सुरक्षित वित्तीय लेनदारों के समान दर्जा दिया गया है।


🧑‍⚖️ प्रमुख न्यायिक निर्णय

1. स्विस रिबन्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ (2019)

  • मुद्दा: IBC की संवैधानिक वैधता।

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने IBC को वैध ठहराया, समयबद्ध और स्टेकहोल्डर हितों का संतुलन सुनिश्चित।

2. एसर स्टील इंडिया लिमिटेड बनाम सतीश कुमार गुप्ता और अन्य (2019)

  • मुद्दा: समाधान योजना की स्वीकृति।

  • निर्णय: CoC का अधिकार प्राथमिक है, लेकिन निर्णय ईमानदारी से होना चाहिए।

3. अर्सेलर मित्तल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम सतीश कुमार गुप्ता (2018)

  • मुद्दा: समाधान योजना और ऑपरेशनल क्रेडिटर्स का हक।

  • निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने योजना को मंजूरी दी और अधिकतम मूल्य वसूलने पर जोर।

4. के. सशिधर बनाम भारतीय विदेशी बैंक (2019)

  • मुद्दा: CoC निर्णय पर सुरक्षित क्रेडिटर्स का विवाद।

  • निर्णय: CoC के निर्णय में केवल दुर्भावना या मनमानेपन की स्थिति में न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।


📌 निष्कर्ष

दिवालियापन और बैंकरप्सी कोड (संशोधन) विधेयक, 2025 भारत में दिवालियापन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, समयबद्ध और प्रभावी बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम है। यह विधेयक लेनदारों को अधिक अधिकार प्रदान करता है, समूह और सीमा-पार दिवालियापन मामलों को सरल बनाता है, और प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करता है।


❓ सामान्य प्रश्न

प्रश्न 1: CIIRP क्या है?
उत्तर: CIIRP एक प्रक्रिया है जिसके तहत वित्तीय लेनदारों को एक कॉर्पोरेट देनदार के दिवालियापन समाधान की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार प्राप्त होता है।

प्रश्न 2: समूह दिवालियापन से क्या लाभ है?
उत्तर: यह समूह के सभी देनदारों के लिए एकीकृत समाधान प्रक्रिया सुनिश्चित करता है, जिससे परिसंपत्ति का अधिकतम मूल्य प्राप्त होता है।

प्रश्न 3: सीमा-पार दिवालियापन से संबंधित क्या प्रावधान हैं?
उत्तर: यह विभिन्न देशों में परिसंपत्तियों या लेनदारों वाले देनदारों के लिए एकीकृत समाधान ढांचा प्रदान करता है।

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